परम रसिक नागर नवल - श्री ध्रुवदास, ब्यालीस लीला, आनंद दशा विनोद (30)

परम रसिक नागर नवल - श्री ध्रुवदास, ब्यालीस लीला, आनंद दशा विनोद (30)

परम रसिक नागर नवल, और न कछू सुहात।
कै भावै छवि देखिबौ, कै सुन्यौ चाहत बात॥

- श्री ध्रुवदास, ब्यालीस लीला, आनंद लता (30)

परम रसिक नव-नागर प्रियतम को केवल दो ही बातें प्रिय लगती हैं—प्रथम, नवल किशोरी प्रिया की छवि का दर्शन; और द्वितीय, उनके श्रीमुख से निकले मधुर वचनों का श्रवण। इसके अतिरिक्त उन्हें और कुछ भी नहीं सुहाता।