(सवैया)
मोर के चन्दन मौर बन्यौ दिन दूलह है अली नंद को नंदन।
श्रीवृषभानुसुता दुलही दिन जोरि बनी बिधना सुखकंदन॥ [1]
रसखानि न आवत मो पै कह्यौ कछु दोउ फँसे छवि प्रेम के फंदन।
जाहि बिलोके सबै सुख पावत ये ब्रजजीवन है दुखदंदन॥ [2]
- श्री रसखान
हे सखी! नंदनंदन मोरपंख से सुसज्जित होकर दूल्हा बने हैं और दुल्हन हैं वृषभान-सुता श्री राधा। विधाता ने इस अनुपम जोड़ी को सुख का मूल और आनंद का आधार बनाया है। [1]
मोर के चन्दन मौर बन्यौ दिन दूलह है अली नंद को नंदन।
श्रीवृषभानुसुता दुलही दिन जोरि बनी बिधना सुखकंदन॥ [1]
रसखानि न आवत मो पै कह्यौ कछु दोउ फँसे छवि प्रेम के फंदन।
जाहि बिलोके सबै सुख पावत ये ब्रजजीवन है दुखदंदन॥ [2]
- श्री रसखान
हे सखी! नंदनंदन मोरपंख से सुसज्जित होकर दूल्हा बने हैं और दुल्हन हैं वृषभान-सुता श्री राधा। विधाता ने इस अनुपम जोड़ी को सुख का मूल और आनंद का आधार बनाया है। [1]
हे रसखान! मैं तो वाणीहीन हूँ, कुछ कह ही नहीं सकता। यह युगल तो प्रेम की मधुर फाँस में बंधा है, जिसकी झलक मात्र से सबको आनंद मिलता है। सचमुच, ब्रज का यह जीवन सभी दुःखों का हरण करने वाला है। [2]

