जहाँ जहाँ चरन परत प्यारी - श्री हरिदास जी (ललिता अवतार), केलिमाल (53)

जहाँ जहाँ चरन परत प्यारी - श्री हरिदास जी (ललिता अवतार), केलिमाल (53)

(राग कल्याण)
जहाँ जहाँ चरन परत प्यारी जू तेरे 
तहाँ तहाँ मन मेरौ करत फिरत परछाँहीं | [1]
बहुत मूरति मेरी चॅवर ढुरावति 
कोऊ बीरी खवावती एकब आरसी लै जाहीं || [2]
और सेवा बहुत भाँतिन की जैसीयै कहैं कोऊ
तैसीयै करौं ज्यौं रुचि जानौं जाहीं | [3]
श्रीहरिदास के स्वामी स्यामा कौं
भलैं मनावत दाइ उपाहीं || [4]
- श्री हरिदास जी (ललिता अवतार), केलिमाल (53)

श्री कृष्ण श्री राधा से कहते हैं कि जहाँ भी आपके कमल स्वरूप चरण पड़ते हैं, मेरा मन मानो परछाईं की तरह उन्ही चरणों के पीछे फिरता है । [1] 
मैं अनेक रूप धारण करके आपकी सेवा करता हूँ, कभी मैं आपको चॅवर ढुराता हूँ, कभी आपको पान खिलाता हूँ और कभी आरसी [शीशा] दिखाता हूँ।  [2]
और भी अनेक प्रकार से आपकी सेवा करता हूँ, जैसा भी कोई कहे वैसा ही मैं आपकी सेवा करूँ, हे प्यारी, मैं आपकी आज्ञा मानकर [रूचि में रूचि रखकर] ही आपकी सेवा नित्य करता रहूँ  । [3]
ललिता अवतार श्री हरिदास जी महाराज कहते हैं कि श्री कृष्ण  श्यामा जू को भली प्रकार से मनाना एवं लाड़ लड़ाना जानते हैं, जब भी उन्हें अवसर मिलता है ।  [4]