देहस्तेऽहं त्वमपि ममाशीति तावत् प्रवादः प्राणस्तेऽहं त्वमपि ममाशीति एतत् प्रलापः।
तेस्यामहमपि तत् बाधितं साधु राधे नो युक्तं नौ प्रणयविषये युष्मदस्मद् प्रयोगः ॥
- कश्चिद् रसिक
श्री कृष्ण बोले: हे लाड़ली जू, आप मेरी देह हो, मैं आपकी देह हूँ । परंतु लाल जी ने सोचा कि यहाँ मन, प्राणादि की भिन्नता रह गई; इस प्रवाद को दूर करते हुए बोले: "आप मेरी प्राण हो, मैं आपका प्राण”। कञ्चिद् भेद यहाँ भी रह गया, अतः यह भी ठीक नहीं है, इस प्रलाप का निरसन करते हुए कृष्ण - "मैं आपका हूँ, आप मेरी हो।" अणुमात्र भिन्नतानुभूति इस बार भी हुई, तो बोले - "यह मैं और तू तो एक झगड़ा ही है, आपके और मेरे मध्य, मैं-तू का प्रयोग ही न हो, यह सर्वोत्तम है।

