व्रज को स्वाद वैकुण्ठ में नाहीं - श्री नागरीदास जी की वाणी, छूटक पद (146)

व्रज को स्वाद वैकुण्ठ में नाहीं - श्री नागरीदास जी की वाणी, छूटक पद (146)

व्रज को स्वाद वैकुण्ठ में नाहीं।
हरि गुन कंथा भई जब मीठी व्रजरस मिल्यो तबे ता माहीं ॥ [1]
व्रजरस बिन कहा रसिक गावते व्रज बिनु रस मरि जातो।
ब्रज महिमा को वेई जानें जिन के व्रज सों नातो ॥ [2]
भुवन चतुर्दश मांझ धन्य ब्रज धनि-धनि ये ब्रजवासी।
नागरीदास धन्य हैं सोई जो व्रज रैनु उपासी।। [3]

- श्री नागरीदास (महाराज सावंत सिंह), श्री नागरीदास जी की वाणी, छूटक पद ( 146)

ब्रज का रस वैकुंठधाम में भी नहीं है। जब हरि की कथा अत्यंत मीठी लगती है तभी ब्रजरस मिलता है। [1]
ब्रजरस के बिना ऐसा क्या है जो रसिकों ने गाया है अर्थात ब्रज रस ही रसिकों ने गाया है, यदि आप ब्रज को हटा (नज़र अंदाज़) देंगे तो आपका सारा रस ही मर (खत्म) जाएगा। ब्रज महिमा को केवल वही जानता है जिसका ब्रज से नाता है। [2]
चौदह लोकों में ब्रज धाम धन्य है एवं ब्रजवासी अत्यंत धनी हैं (जिसकी कल्पना करना भी कठिन है)। श्री नागरीदास जी कहते हैं कि हमारी दृष्टि में तो वही धन्य है जो ब्रज रज का उपासी है। [3]