राधाकेलि-निकुञ्ज-वीथीषु चरन्नराधाभिधामुच्चरन्-
राराधा अनुरुपमेवपरमं धर्म्म रसेनाचरन् ।
राधायाश्चरणाम्बुजं परिचरन्नानोपचारैमुंदा,
कर्हि स्यां श्रुति शेखरोपरिचरन्नाश्चर्य्यचर्याचरन् ।।
- श्री हित हरिवंश महाप्रभु, श्री राधा सुधा निधि (138)
मैं श्री राधा के केलिभवन कुञ्ज-वीथियों [श्री वृंदावन] में कब विचरण करूँगी? कब केवल और केवल श्री राधा का ही नाम लेकर उनकी अनन्य भक्ति करूँगी और अपना परम धर्म (अपने किंङ्करी-स्वरूप) का रस पूर्वक आचरण करते हुए श्री राधा चरणों की विविध प्रकार द्वारा निष्ठा पूर्वक सेवा करूँगी? ऐसा आचरण करती हुई कब वेदोपरि आचरण युक्त हो जाऊँगी?

