(राग गौरी)
यह जु एक मन बहुत ठौर करि, कहि कौनें सचु पायौ ।
जहँ तहँ विपति जार जुवती लौं, प्रगट पिंगला गायौ ॥[1]
द्वै तुरंग पर जोरि चढ़त हठि, परत कौन पै धायौ ।
कहिधौं कौन अंक पर राखै, जौ गनिका सुत जायौ ॥[2]
(जै श्री) हित हरिवंश प्रपंच बंच सब काल ब्याल कौ खायौ ।
यह जिय जानि स्याम-स्यामा पद कमल संगि सिर नायो ॥ [3]
- श्री हरिवंश महाप्रभु, श्री हित चौरासी (59)
यह पद श्री हित हरिवंश महाप्रभु ने श्री हरिराम व्यास के प्रश्नों के उत्तर में कहा था, जिसके बाद श्री हरिराम व्यास जी उनके शिष्य बन गये थे।
श्री हित महाप्रभु कहते हैं: इस एक मन को बहुत स्थानों पर लगाकर कहो किसने सुख पाया ? बहुत जगह मन को नचाने वाले को तो जार युवती ( व्यभिचारिणी ) की भाँति जहाँ तहाँ दुःख ही दुःख है , पिंगला वेश्या ने इसका स्पष्ट गान किया है । [1]
दो घोड़ों को एक साथ जोड़ कर भला हठ पूर्वक उन दोनों के ऊपर कौन बैठ कर उन्हें दौड़ा सकता है ? तुम्हीं बताओ गणिका से उत्पन्न पुत्र को कौन पिता अपनी गोद में ले ( अर्थात् वह किसका पुत्र कहा जाय ? ) [2]
श्रीहित हरिवंश चन्द्र महाप्रभुपाद कहते हैं यह विश्व प्रपञ्च एक दम झूठा है – असत् है और काल सर्प से ग्रसित है ( अर्थात् अवश्य विनाशी है , ) ऐसा अपने हृदय में समझ कर मैंने श्रीश्यामा श्याम पद कमल सङ्गी – रसिक भक्त जनों को अपना मस्तक झुका दिया अर्थात् उनके प्रति समर्पण पूर्वक मैंने उनका ही एक मात्र चरणाश्रय ग्रहण किया है । [3]
यह जु एक मन बहुत ठौर करि, कहि कौनें सचु पायौ ।
जहँ तहँ विपति जार जुवती लौं, प्रगट पिंगला गायौ ॥[1]
द्वै तुरंग पर जोरि चढ़त हठि, परत कौन पै धायौ ।
कहिधौं कौन अंक पर राखै, जौ गनिका सुत जायौ ॥[2]
(जै श्री) हित हरिवंश प्रपंच बंच सब काल ब्याल कौ खायौ ।
यह जिय जानि स्याम-स्यामा पद कमल संगि सिर नायो ॥ [3]
- श्री हरिवंश महाप्रभु, श्री हित चौरासी (59)
यह पद श्री हित हरिवंश महाप्रभु ने श्री हरिराम व्यास के प्रश्नों के उत्तर में कहा था, जिसके बाद श्री हरिराम व्यास जी उनके शिष्य बन गये थे।
श्री हित महाप्रभु कहते हैं: इस एक मन को बहुत स्थानों पर लगाकर कहो किसने सुख पाया ? बहुत जगह मन को नचाने वाले को तो जार युवती ( व्यभिचारिणी ) की भाँति जहाँ तहाँ दुःख ही दुःख है , पिंगला वेश्या ने इसका स्पष्ट गान किया है । [1]
दो घोड़ों को एक साथ जोड़ कर भला हठ पूर्वक उन दोनों के ऊपर कौन बैठ कर उन्हें दौड़ा सकता है ? तुम्हीं बताओ गणिका से उत्पन्न पुत्र को कौन पिता अपनी गोद में ले ( अर्थात् वह किसका पुत्र कहा जाय ? ) [2]
श्रीहित हरिवंश चन्द्र महाप्रभुपाद कहते हैं यह विश्व प्रपञ्च एक दम झूठा है – असत् है और काल सर्प से ग्रसित है ( अर्थात् अवश्य विनाशी है , ) ऐसा अपने हृदय में समझ कर मैंने श्रीश्यामा श्याम पद कमल सङ्गी – रसिक भक्त जनों को अपना मस्तक झुका दिया अर्थात् उनके प्रति समर्पण पूर्वक मैंने उनका ही एक मात्र चरणाश्रय ग्रहण किया है । [3]

