कबै हरि बनिहौं ब्रज को मोर ।
लखि घनश्याम जानि घनश्यामहिं, ह्वैहौं प्रेम विभोर ।। [1]
प्रेम विभोर होत ही नचिहौं, झुकि झुकि पंख मरोर ।
नाचत पंख मरोर मोर मन, उठिहैं सरस हिलोर ।। [2]
उठत हिलोर ‘श्याम’ ! इमि कहि कहि, शोर मचैहौं घोर ।
मोर मुकुट हित हौं ‘कृपालु’ नित, दैहौं पंखन तोर ।। [3]
- जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज, प्रेम रस मदिरा, दैन्य माधुरी (20)
हे श्यामसुन्दर ! मैं तुम्हारे ब्रजधाम में मोर कब बनूँगा ? मोर बनकर काले बादलों के समान तुमको सचमुच ही काला बादल समझ कर कब प्रेम – विभोर होऊँगा ? [1]
प्रेम – विभोर होकर कब झुक – झुक कर अपने पंखों को मरोड़ – मरोड़ कर नाचूँगा ? पंख मरोड़ कर नाचते हुए मेरे मन में कब मधुर हिलोरें उठेंगी ? [2]
हिलोर उठने पर मैं कब ‘श्याम’ ‘श्याम’, ऐसा कह – कहकर घनघोर शोर मचाऊँगा ? ‘श्री कृपालु जी’ कहते हैं कि वह दिन कब आयेगा जब मैं तुम्हारे मोर – मुकुट के हेतु नित्य अपने पंख तोड़ कर दिया करूँगा ? [3]
लखि घनश्याम जानि घनश्यामहिं, ह्वैहौं प्रेम विभोर ।। [1]
प्रेम विभोर होत ही नचिहौं, झुकि झुकि पंख मरोर ।
नाचत पंख मरोर मोर मन, उठिहैं सरस हिलोर ।। [2]
उठत हिलोर ‘श्याम’ ! इमि कहि कहि, शोर मचैहौं घोर ।
मोर मुकुट हित हौं ‘कृपालु’ नित, दैहौं पंखन तोर ।। [3]
- जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज, प्रेम रस मदिरा, दैन्य माधुरी (20)
हे श्यामसुन्दर ! मैं तुम्हारे ब्रजधाम में मोर कब बनूँगा ? मोर बनकर काले बादलों के समान तुमको सचमुच ही काला बादल समझ कर कब प्रेम – विभोर होऊँगा ? [1]
प्रेम – विभोर होकर कब झुक – झुक कर अपने पंखों को मरोड़ – मरोड़ कर नाचूँगा ? पंख मरोड़ कर नाचते हुए मेरे मन में कब मधुर हिलोरें उठेंगी ? [2]
हिलोर उठने पर मैं कब ‘श्याम’ ‘श्याम’, ऐसा कह – कहकर घनघोर शोर मचाऊँगा ? ‘श्री कृपालु जी’ कहते हैं कि वह दिन कब आयेगा जब मैं तुम्हारे मोर – मुकुट के हेतु नित्य अपने पंख तोड़ कर दिया करूँगा ? [3]

