दृष्टि चौंप बर फंदा मन राख्यौ लै पंछी बिहारी - स्वामी हरिदास जी, केलीमाल (9)

दृष्टि चौंप बर फंदा मन राख्यौ लै पंछी बिहारी - स्वामी हरिदास जी, केलीमाल (9)

(राग कान्हरौ)
दृष्टि चौंप बर फंदा मन राख्यौ लै पंछी बिहारी।
चुनों सुभाव प्रेम जल अंग स्त्रवत
पिवत न अघात रहे मुख निहारी॥ [1]
प्यारी प्यारी रटत रहत छिन ही छिन याकें और न कछु हिया री।
सुनी हरिदास पंछी नाना रंग देखत ही देखत ही प्यारी जू न हारी॥ [2]

- ललिता अवतार श्री स्वामी हरिदास जी, केलीमाल (9)

श्री राधा की रस भरी दृष्टि ही एक फंदे के समान है जिसमें बिहारी [कृष्ण] रूपी पक्षी नित्य ही फँसा हुआ है । श्री प्यारी जू का कृपालुता का स्वभाव इस बिहारी पक्षी का पोषण करता है । श्री प्यारी जू के रोम रोम से केवल रस टपकता है, वही प्रेम रंग रस यह बिहारी पक्षी पीता रहता है परंतु कभी भी संतुष्ट नहीं होता । [1]
यह बिहारी पक्षी नित्य ही “प्यारी प्यारी" रटता रहता है, इसके हृदय में प्यारी जू [राधा] के अतिरिक्त कुछ भी नहीं है । हे हरिदास [श्री ललिता सखी अपनी हरिदास रूपी देह से कहती हैं ]: यह बिहारी पंछी नाना प्रकार से केली कर प्यारी जू का मुख ही निहारता रहता है, और कभी भी हार नहीं मानता । [2]