कोटिक प्राण चरण पर वारौं ।
कैसे हैं सो चरण लाड़िली, सपने नैंक निहारौं ।। [1]
त्रिभुवन शोभा धाम लाड़िले, जेहि नित हिये लगावैं ।
कैसे शीतल सजल जलज सो, तेरे चरण सुहावैं ।। [2]
श्रीहरिवंश स्व सरबस भाख्यौ, अधिक प्राण तैं प्यारे ।
पिय दृग अटक रहे जहँ प्यारी, सो शुभ चरण तिहारे ।। [3]
शिव श्रीहरि अज पद रज चाहीं, गोपिन सिर पर धारे ।
कैसे सरस चरण सो प्यारी, नित रस बरसत हारे ।। [4]
श्रवनन सुनत लगत अति प्यारे, देखन दृग ललचावै ।
'भोरी' कृपा करहु अलबेली, बार-बार बलि जावै ।। [5]
- श्री भोरी सखी, प्रेम की पीर (57)
हे श्री राधे ! मैं आपके श्री चरणों पर अपने कोटि - कोटि प्राणो को न्योछावर करती हूँ। हे लाडिली ! आपके वे श्री चरण कैसे हैं, उन्हें मैंने सपने में भी नहीं देखा है । [1]
किन्तु यह अवश्य सुना है की तीनो लोको में परम शोभाशाली परम लाड़िले श्री श्यामसुंदर उन्हें अपने हृदय में सदैव विराजित रखते हैं । कृपा के जल से भरे हुए , परम शीतल आपके वे चरण-कमल कैसे है, यह तो पता नहीं; किन्तु इन गुणों को सुनने के कारण, वे मेरे मन को अत्यंत अच्छे लगते हैं । [2]
श्रीहित हरिवंशचन्द्र महाप्रभु ने उन्हें अपने प्राणों से भी अधिक प्रिय, अपना जीवन सर्वस्व बताया है । हे प्यारी जू ! प्रियतम श्री श्यामसुंदर के नेत्र जहाँ अटक रहे हैं, वह स्थान आपके शुभ श्री चरण ही हैं । [3]
ब्रह्मा - विष्णु - महेश आपके चरणों की धूलि को प्राप्त करने की लालसा निरंतर करते ही रहते है और ब्रज गोपियों ने भी उसे अपने मस्तक पर धारण किया है । आपके श्री चरण रस से भरे हुए हैं और सदैव रस की वर्षा करते रहते है । [4]
उनके गुणों और महिमा को सुनकर, वे मुझे अत्यंत प्रिय लगने लगे हैं ; किन्तु अभी तक मैंने उनका साक्षात्कार प्राप्त नहीं किया है । मेरे हृदय में उन्हें देखने की लोल-लालसा दिन-रात बनी रहती है । श्रीहित भोरी सखी जी निवेदन करती है कि हे अलबेली श्री राधे ! आप मुझ पर अपनी कृपा-दृष्टि प्रदान करे, मैं उन श्री चरणों पर स्वयं को बार-बार न्योछावर करती हूँ । [5]
कैसे हैं सो चरण लाड़िली, सपने नैंक निहारौं ।। [1]
त्रिभुवन शोभा धाम लाड़िले, जेहि नित हिये लगावैं ।
कैसे शीतल सजल जलज सो, तेरे चरण सुहावैं ।। [2]
श्रीहरिवंश स्व सरबस भाख्यौ, अधिक प्राण तैं प्यारे ।
पिय दृग अटक रहे जहँ प्यारी, सो शुभ चरण तिहारे ।। [3]
शिव श्रीहरि अज पद रज चाहीं, गोपिन सिर पर धारे ।
कैसे सरस चरण सो प्यारी, नित रस बरसत हारे ।। [4]
श्रवनन सुनत लगत अति प्यारे, देखन दृग ललचावै ।
'भोरी' कृपा करहु अलबेली, बार-बार बलि जावै ।। [5]
- श्री भोरी सखी, प्रेम की पीर (57)
हे श्री राधे ! मैं आपके श्री चरणों पर अपने कोटि - कोटि प्राणो को न्योछावर करती हूँ। हे लाडिली ! आपके वे श्री चरण कैसे हैं, उन्हें मैंने सपने में भी नहीं देखा है । [1]
किन्तु यह अवश्य सुना है की तीनो लोको में परम शोभाशाली परम लाड़िले श्री श्यामसुंदर उन्हें अपने हृदय में सदैव विराजित रखते हैं । कृपा के जल से भरे हुए , परम शीतल आपके वे चरण-कमल कैसे है, यह तो पता नहीं; किन्तु इन गुणों को सुनने के कारण, वे मेरे मन को अत्यंत अच्छे लगते हैं । [2]
श्रीहित हरिवंशचन्द्र महाप्रभु ने उन्हें अपने प्राणों से भी अधिक प्रिय, अपना जीवन सर्वस्व बताया है । हे प्यारी जू ! प्रियतम श्री श्यामसुंदर के नेत्र जहाँ अटक रहे हैं, वह स्थान आपके शुभ श्री चरण ही हैं । [3]
ब्रह्मा - विष्णु - महेश आपके चरणों की धूलि को प्राप्त करने की लालसा निरंतर करते ही रहते है और ब्रज गोपियों ने भी उसे अपने मस्तक पर धारण किया है । आपके श्री चरण रस से भरे हुए हैं और सदैव रस की वर्षा करते रहते है । [4]
उनके गुणों और महिमा को सुनकर, वे मुझे अत्यंत प्रिय लगने लगे हैं ; किन्तु अभी तक मैंने उनका साक्षात्कार प्राप्त नहीं किया है । मेरे हृदय में उन्हें देखने की लोल-लालसा दिन-रात बनी रहती है । श्रीहित भोरी सखी जी निवेदन करती है कि हे अलबेली श्री राधे ! आप मुझ पर अपनी कृपा-दृष्टि प्रदान करे, मैं उन श्री चरणों पर स्वयं को बार-बार न्योछावर करती हूँ । [5]

