कदा वृन्दारण्ये मधुर मधुरानन्द रसदे - श्री हित हरिवंश महाप्रभु, श्री राधा सुधा निधि (137)

कदा वृन्दारण्ये मधुर मधुरानन्द रसदे - श्री हित हरिवंश महाप्रभु, श्री राधा सुधा निधि (137)

कदा वृन्दारण्ये मधुर मधुरानन्द रसदे,
प्रियेश्वर्य्या केलीभवन नव कुञ्जानी मृगये।
कदा श्रीराधाया: पद-कमल माध्वीक लहरी,
परीवाहैश्चेतो प्रपैलो मधुकरमधीरं मदयिता ।।

- श्री हित हरिवंश महाप्रभु, श्री राधा सुधा निधि (137)

मैं मधुर से भी मधुर आनंद-रस-प्रद श्रीवृन्दावन में प्रियेश्वरी श्रीराधा के केलि-भवन नव-कुञ्ज-पुञ्जों का कब अन्वेषण करूँगी ? और श्रीराधा चरण कमल मकरन्द लहरों के नित्य वर्षण से मेरा मन-मधुकर कब अधीर और मद-मत्त हो जायगा ?