(राग पूर्वी चौताला)
राधा राधा रटि राधा राधा रटि मेरी रसना रसीली भई।
ज्यौं हीं ज्यौं पीवति या रस कों त्यौं त्यौं प्यास नई।। [1]
ब्रजजीवन की परम सजीवन सो निज जीवनि जानि लई।
आनंदघन उमंग-झर लाग्यौ ह्वै रही नाममई॥ [2]
- श्री आनन्दघन जी, घनानंद ग्रंथावली, पदावली (500)
श्री आनंदघन कह रहे हैं "राधा राधा रटते रटते मेरी रसना रसीली बन गयी है, एवं जितना अधिक इस अद्भुत रस का पान करता हूँ, उतनी ही अधिक नवीन प्यास प्रकट हो रही है । [1]
श्री राधा नाम समस्त ब्रज धाम के प्रत्येक जीव की प्राण संजीवनी है, इस रहस्य को जान कर मैंने श्री राधा नाम को अपना निज प्राण समझ ग्रहण कर लिया है, जिसके परिणाम स्वरुप मेरे ह्रदय से उमंग झर रहा है, और मेरा जीवन श्री राधा नाम मय हो गया है। [2]
राधा राधा रटि राधा राधा रटि मेरी रसना रसीली भई।
ज्यौं हीं ज्यौं पीवति या रस कों त्यौं त्यौं प्यास नई।। [1]
ब्रजजीवन की परम सजीवन सो निज जीवनि जानि लई।
आनंदघन उमंग-झर लाग्यौ ह्वै रही नाममई॥ [2]
- श्री आनन्दघन जी, घनानंद ग्रंथावली, पदावली (500)
श्री आनंदघन कह रहे हैं "राधा राधा रटते रटते मेरी रसना रसीली बन गयी है, एवं जितना अधिक इस अद्भुत रस का पान करता हूँ, उतनी ही अधिक नवीन प्यास प्रकट हो रही है । [1]
श्री राधा नाम समस्त ब्रज धाम के प्रत्येक जीव की प्राण संजीवनी है, इस रहस्य को जान कर मैंने श्री राधा नाम को अपना निज प्राण समझ ग्रहण कर लिया है, जिसके परिणाम स्वरुप मेरे ह्रदय से उमंग झर रहा है, और मेरा जीवन श्री राधा नाम मय हो गया है। [2]

