(कवित्त)
अलबेली चितवनि मुसिकनि अलबेली,
अलबेली चलनि ललन मन हरयौ है। [1]
वृंदावन-मही सब भई छबिमई आली,
पग-पग पर मानौं रूप झरि परयौ है॥ [2]
कनक बरन भये पत्र-फूल द्रुमनि के,
आभा तन रही छाइ कुंदन सो ढरयौ है। [3]
'हित ध्रुव' ऐसी भाँति झलकति तन काँति,
चितवत पिय चित नैकहुँ न टरयौ है॥ [4]
- श्री ध्रुवदास, बयालीस लीला, श्रृंगार शत 1 (22)
श्री लाड़िली की विलक्षण चितवन, मनमोहिनी मुस्कान एवं ललित पदन्याय ने श्री लाल का मन हरण कर लिया है। [1]
अलबेली चितवनि मुसिकनि अलबेली,
अलबेली चलनि ललन मन हरयौ है। [1]
वृंदावन-मही सब भई छबिमई आली,
पग-पग पर मानौं रूप झरि परयौ है॥ [2]
कनक बरन भये पत्र-फूल द्रुमनि के,
आभा तन रही छाइ कुंदन सो ढरयौ है। [3]
'हित ध्रुव' ऐसी भाँति झलकति तन काँति,
चितवत पिय चित नैकहुँ न टरयौ है॥ [4]
- श्री ध्रुवदास, बयालीस लीला, श्रृंगार शत 1 (22)
श्री लाड़िली की विलक्षण चितवन, मनमोहिनी मुस्कान एवं ललित पदन्याय ने श्री लाल का मन हरण कर लिया है। [1]
उनके छवि-निर्झरण से वृन्दावन की समस्त भूमि छबिमयी बन गई है, जहाँ-जहाँ श्रीजी के चरण रखते हैं, वहाँ-वहाँ रूप सौंदर्य झरता (बरसता) है। [2]
हे सखि! ऐसा प्रतीत होता है मानो श्री प्रिया के अंगों की आभा ही कुंदन बनकर चारों ओर प्रवाहित हो रही हो। [3]
श्री ध्रुवदास जी कहते हैं कि प्रिया की अद्भुत देह-कान्ति का दर्शन करके प्रियतम का चित्त विस्मृत-गति हो गया है। [4]

