सीस मुकुट, कटि काछनी, कर मुरली उर माल।
यह बानिक मो मन बसौ, सदा बिहारीलाल॥
- श्रीमहाकवी श्री बिहारी लाल, बिहारी सतसई (2)
हे बाँके बिहारी लाल! आप नित्य ही मेरे मन में उसी रूप में विराजमान रहें—जिसमें आपके शीश पर मुकुट हो, कमर में काछनी बँधी हो, हाथों में मुरली हो और उर पर सुंदर माला सुशोभित हो।

