(राग ललित)
हौं तो प्यारी प्रीतम की बलिहारी।
करत केलि भुज मेलि ग्रीव, सुख विहरत कुंज बिहारी ॥ [1]
मुरली अधर मधुर धुनि बाजत, पग नूपुर झनकारी।
चंद स्वामिनी उरप तिरप गति, लेत छबीली न्यारी न्यारी॥ [2]
- श्री चंद्र सखी
मैं प्रीतम प्यारी की बलिहारी जाती हूं जब दिव्य दम्पति श्री राधा कृष्ण श्री वृंदावन धाम में भुजाओं को मिलाए हुए नित्य ही केली करते हैं एवं सुख बरसाते हैं । [1]
श्री कृष्ण मुरली को अधरों से लगाकर मधुर धुनी बजाते हैं, एवं श्री राधा नूपुर की झंकार करती हैं । श्री चंद्र सखी कहती हैं कि वह दोनों तीव्र गति से नृत्य करते हैं, एवं श्री छबीली जू [राधारानी] तो न्यारी न्यारी गति से नृत्य करती हैं एवं ऐसा नृत्य करती हैं जैसा कभी नहीं किया। [2]
हौं तो प्यारी प्रीतम की बलिहारी।
करत केलि भुज मेलि ग्रीव, सुख विहरत कुंज बिहारी ॥ [1]
मुरली अधर मधुर धुनि बाजत, पग नूपुर झनकारी।
चंद स्वामिनी उरप तिरप गति, लेत छबीली न्यारी न्यारी॥ [2]
- श्री चंद्र सखी
मैं प्रीतम प्यारी की बलिहारी जाती हूं जब दिव्य दम्पति श्री राधा कृष्ण श्री वृंदावन धाम में भुजाओं को मिलाए हुए नित्य ही केली करते हैं एवं सुख बरसाते हैं । [1]
श्री कृष्ण मुरली को अधरों से लगाकर मधुर धुनी बजाते हैं, एवं श्री राधा नूपुर की झंकार करती हैं । श्री चंद्र सखी कहती हैं कि वह दोनों तीव्र गति से नृत्य करते हैं, एवं श्री छबीली जू [राधारानी] तो न्यारी न्यारी गति से नृत्य करती हैं एवं ऐसा नृत्य करती हैं जैसा कभी नहीं किया। [2]

