रहस्यं श्रीराधेत्यखिल निगमानामिव धनं,
निगूढं यद्वाणी जपत सततं पातु न परम् ।
प्रदोषे हग्मोषे पुलिनगमनायाति मधुरं,
वलत्तस्याश्चञ्चच्चरणयुगमास्तां मनसि मे ॥
- श्री विट्ठलनाथ जी (गुसाईं जी), श्री स्वामिनियाष्टकम् (1)
समस्त निगमागमों का धन, निगूढ़ पर रहस्य के समान, 'श्रीराधे’' वह नाम ही मेरी इस वाणी से उच्चारण होता रहे। इसके अतिरिक्त और कोई नाम उच्चरित ही न हो। साधारण अंधेरे प्रदोष (सायंकाल) के समय मधुर पति से उठने वाले चञ्चल युगल-चरण-कमल मेरे मन में बसे रहें।

