प्यारी जू आगै चलि - ललिता अवतार श्री स्वामी हरिदास जी, केलीमाल (46)

प्यारी जू आगै चलि - ललिता अवतार श्री स्वामी हरिदास जी, केलीमाल (46)

(राग केदारौ)
प्यारी जू आगै चलि आगैं चलि
गहवर बन भीतर जहाँ बोलै कोइल री ।
अति ही बिचित्र फूल पत्रनि की सेज्या रची 
रुचिर सँवारी तहाँ तूब सोइल री ।। [1]
छिन छिन पल पल तेरीऐ कहानी तुव मग जोइल री ।
श्रीहरिदास के स्वामी स्याम कहत छबीलौ
काम रस भोलइ री ।। [2]
- ललिता अवतार श्री स्वामी हरिदास जी, केलीमाल (46)

हरिदासी [ललिता] सखी कहती हैं: श्री प्यारी ज़ू [राधा रानी] आगे आगे चलिए, गहवर वन के भीतर और भीतर जहाँ कोयल गा रही है । वहाँ अति ही विचित्र फूलों एवं पत्तों से बनी सेज रची हुई है, वहाँ आप आराम कीजिए। [1] 
हर क्षण हर पल श्री बाँके बिहारी केवल आपकी ही चर्चा एवं आपके ही गुण गाते हैं एवं आपकी ही प्रतीक्षा करते हैं। स्वामी हरिदास जी महाराज कहते हैं कि हे सखी, छबीले श्याम सुंदर काम रस में भीग रहे हैं। [2]