राधा पुरः स्फुरति पश्चिमतश्च राधा - श्री रूप गोस्वामी, विदग्धमाधव (5.18)

राधा पुरः स्फुरति पश्चिमतश्च राधा - श्री रूप गोस्वामी, विदग्धमाधव (5.18)

राधा पुरः स्फुरति पश्चिमतश्च राधा।
राधाधिसव्यमिह दक्षिणतश्च राधा।।
राधा खलु क्षितितले गगने च राधा।
राधामयी मम बभूव कुतस्त्रिलोकी।।

- श्री रूप गोस्वामी, विदग्धमाधव (5.18)

श्री निकुंज बिहारी निकुंज देखकर बोलते हैं -
हा, यह क्या है! मेरे आगे राधा, मेरे पीछे राधा, मेरे बायीं ओर मेरी सेव्य राधा, मेरे दाहिनी ओर राधा, इस पृथ्वी पर भी राधा, आकाश में राधा, राधामय ही मुझे यह त्रिलोकी क्यों हो गई?