रसमय धाम सृष्टि - श्री वृंदावन दास चाचा जी,  युगल स्नेह पत्रिका (102)

रसमय धाम सृष्टि - श्री वृंदावन दास चाचा जी, युगल स्नेह पत्रिका (102)

रसमय धाम सृष्टि जहाँ रसमय कथा अलौकिक न्यारी ।
रासेश्वरी कृपा तैं जानै और नहीं अधिकारी ॥ [1]
बुधिबल करत करि गये करि हैं पंडित और अनारी । 
वृन्दावन हित रूप न परचे नीरस तर्क विकारी ॥ [2]
- श्री वृंदावन दास चाचा जी,  युगल स्नेह पत्रिका

वृन्दावन जैसा रसमय धाम, जिसकी रसमय अलौकिक कथा भी जग से न्यारी है, एक मात्र श्री रासेश्वरी [श्री राधा] की कृपा से ही प्राप्त किया जा सकता है, इसका और कोई भी अधिकारी नहीं है। [1]
श्री हित वृंदावन दास [चाचा जी] कहते हैं कि अपनी बुद्धि के बल से, पांडित्य से, नीरस हृदय से, तार्किक बुद्धि से, अनंत प्रकार की साधनाओं इत्यादि से भी इस वृन्दावन के अद्भुत रूप रस तक पहुंचना असंभव है, यह केवल और केवल एक मात्र श्री राधारानी की अकारण कृपा से ही प्राप्त किया जा सकता है।  [2]