साँवरे क्यों मोसौं रिस मानी। [1]
तेरे काज धरबार त्यागी कै,
गलियन फिरत दिवानी ॥ [2]
लोक-लाज, कुलरीति प्रीति-जग,
इनहूँ कौ दियौ पानी। [3]
'नारायण' अब तो हँसि चितवौं,
एरे रूप गुमानी॥ [4]
- श्री नारायण स्वामी
अरे साँवरे [कृष्ण], मुझसे क्यूँ मान किया हुआ है ? [1]
तेरे लिए मैंने अपना घरबार त्याग कर, दीवानी बनकर ब्रज की गलियों में डोल रहा हूँ । [2]
लोक लाज, कुलरीति, जग की प्रीती को मैंने पानी में बहा दिया है । [3]
श्री नारायण स्वामी कहते हैं कि हे रूप के गुमानी ! अब तो मेरी ओर हंस कर अपनी मधुर चितवन डालो । [4]
तेरे काज धरबार त्यागी कै,
गलियन फिरत दिवानी ॥ [2]
लोक-लाज, कुलरीति प्रीति-जग,
इनहूँ कौ दियौ पानी। [3]
'नारायण' अब तो हँसि चितवौं,
एरे रूप गुमानी॥ [4]
- श्री नारायण स्वामी
अरे साँवरे [कृष्ण], मुझसे क्यूँ मान किया हुआ है ? [1]
तेरे लिए मैंने अपना घरबार त्याग कर, दीवानी बनकर ब्रज की गलियों में डोल रहा हूँ । [2]
लोक लाज, कुलरीति, जग की प्रीती को मैंने पानी में बहा दिया है । [3]
श्री नारायण स्वामी कहते हैं कि हे रूप के गुमानी ! अब तो मेरी ओर हंस कर अपनी मधुर चितवन डालो । [4]

