जद्यपि न्हात न ऊर्ध्व गति - श्री नागरीदास जी की वाणी, ब्रज सार (6)

जद्यपि न्हात न ऊर्ध्व गति - श्री नागरीदास जी की वाणी, ब्रज सार (6)

जद्यपि न्हात न ऊर्ध्व गति, जाति च्यारी ह्वैं पानि।
तदपि न तीरथ जल कोऊ, ब्रज की धूरि समानि॥

- श्री नागरीदास (महाराज सावंत सिंह जी), श्री नागरीदास जी की वाणी, ब्रज सार (6)

यद्यपि चारों धामों तथा अन्य तीर्थों का जल अत्यंत श्रेष्ठ है और मुक्तिपद देने वाला है, फिर भी वे ब्रज-रज की समता कदापि नहीं कर सकते।