मंजुस्वभावमधिकल्पलतानिकुंजं व्यंजंतमद्भुतकृपारसपुंजमेव ।
प्रेमामृताम्बुधिमगाधमबाधमेतं राधाभिधं द्रुतमुपाश्रय साधु चेत ।।
- श्री हित हरिवंश महाप्रभु, श्री राधा सुधा निधि (27)
हे मन, तू उस श्रीराधा नामक प्रेमामृत के अगाध और बाधा शून्य सागर का शीघ्र भलीभाँति आश्रय ग्रहण कर जो कोमल स्वभाव वाला (है), जो कल्पलता की कुंज में विराजमान (है) और जो अद्भुत कृपा रस के समूह को प्रकट करता है।।

