मेरो मन एक ही ठौर भलौ।
निस बासर जागत अरु सोवत सुपने हूँ न चलौ।। [1]
श्री बिहारी बिहारिन के पद पंकज यों अलि ह्वै अचलौ।
श्री बिहारीदास बन बसत पाईयत संतत सुख अगलौ।। [2]
- श्री बिहारिन देव, श्री बिहारिन देव जू की वाणी, सिद्धांत के पद (173)
मेरा मन तो एक ही ठौर लगा हुआ है [श्री राधा कृष्ण में], इसी में मेरी भलाई है । नित्य ही जागते और सोते एवं सपने में भी यह कहीं और नहीं जाता [एवं जाया करे] । [1]
हे सखी अब श्री बिहारी बिहारिन की चरणों की कृपा से इस मन का सहज स्वभाव केवल बिहारी बिहारिन के चरण कमल में जाने का ही गया है एवं अन्यत्र जगह से अब वह अचला [पंगु] हो चुका है । श्री बिहारिन दास जी कहते हैं कि वह इस बन [वृंदावन] की कृपा [ वृंदावन वास] से नित्य सुख पा रहे हैं एवं अगले क्षण [आने वाले समय में भी] रस ही पाएँगे । [2]
निस बासर जागत अरु सोवत सुपने हूँ न चलौ।। [1]
श्री बिहारी बिहारिन के पद पंकज यों अलि ह्वै अचलौ।
श्री बिहारीदास बन बसत पाईयत संतत सुख अगलौ।। [2]
- श्री बिहारिन देव, श्री बिहारिन देव जू की वाणी, सिद्धांत के पद (173)
मेरा मन तो एक ही ठौर लगा हुआ है [श्री राधा कृष्ण में], इसी में मेरी भलाई है । नित्य ही जागते और सोते एवं सपने में भी यह कहीं और नहीं जाता [एवं जाया करे] । [1]
हे सखी अब श्री बिहारी बिहारिन की चरणों की कृपा से इस मन का सहज स्वभाव केवल बिहारी बिहारिन के चरण कमल में जाने का ही गया है एवं अन्यत्र जगह से अब वह अचला [पंगु] हो चुका है । श्री बिहारिन दास जी कहते हैं कि वह इस बन [वृंदावन] की कृपा [ वृंदावन वास] से नित्य सुख पा रहे हैं एवं अगले क्षण [आने वाले समय में भी] रस ही पाएँगे । [2]

