रसिकनी राधा राधा है -  श्री आनन्दघन जी, घनानंद ग्रंथावली, पदावली (792)

रसिकनी राधा राधा है - श्री आनन्दघन जी, घनानंद ग्रंथावली, पदावली (792)

रसिकनी राधा राधा है ।
जाके मिलिबे की मोहन के नित ही साधा है ।। [1]
ब्रजमोहन मोह्वौ इन आछै रही न बाधा है ।
परम प्रेम रस-निधि आनँदघन प्रेम-समाधा है ।। [2]
-  श्री आनन्दघन जी, घनानंद ग्रंथावली, पदावली (792) 

श्री आनंदघन कह रहे है "रस प्रदान करनेवाली रस की मूर्तिमान स्वरुप, मूल रूप से रस स्वरुप, रसिकनी केवल श्री राधा हैं, जिनसे मिलने के लिए श्री श्यामसुंदर नित्य ही प्रयास रत रहते हैं। [1]
श्री राधा रानी ने ब्रजमोहन श्री श्यामसुंदर को बिना किसी बाधा के भली प्रकार से मोह लिया है। श्री आनंद घन कहते हैं कि श्री  राधा प्रेम मूर्ति हैं, रस की निधि हैं एवं प्रेम की समाधि हैं । [2]