(राग कन्हारो एवं विहागरौ)
रस में रहत गढ़ी हो रसिकनी।
कनक बेलि वृषभानु नंदनी श्याम तमाल चढ़ी ।। [1]
विहरत संग लाल गिरिधर के कौन भाँति पढ़ी।
‘कुम्भन दास’ लाल गिरधर संग रति रस केलि वढी।। [2]
- श्री कुंभनदास, श्री कुम्भनदास जी की वाणी (172)
देवदुर्लभ अचिन्त्य प्रेम रस की मूल स्रोत श्री राधिका जू पूर्ण रूप से अपने दिव्य स्नेह और रस में डूबी हुई हैं। श्री वृषभानु नन्दिनी श्याम वर्ण के तमाल वृक्ष के चारों ओर लिपटी एक सुनहरी बेल के समान हैं । [1]
वे सदैव नित्य किशोर श्री कृष्ण के संग नित्य विहार परायण हैं। श्री कुंभनदासजी अब कहते हैं "जब श्री जुगल किशोर केलि परायण होते हैं तो उनके केलि लीला से अद्भुत प्रेम का निर्झरण होता रहता है।" [2]

