प्रिय हमरे अंतर रहै, हम प्रिय के अंतर।
अंग संग निरखें केली सुख, सदांई रहत निरंतर॥
- श्री ललित किशोरी देव, श्री ललित किशोरी देव जू की वाणी, सिद्धान्त की साखी (278)
हमारा श्री राधा जू से ऐसा घनिष्ठ संबंध है कि वे हमारे तन, मन और प्राण सहित हमारे रोम-रोम में समाई हुई हैं; और हम भी उनके भीतर ही समाए हुए हैं तथा उनके अंग-संग की केलि-सुखमयी लीला का सदा अवलोकन करते रहते हैं।
अंग संग निरखें केली सुख, सदांई रहत निरंतर॥
- श्री ललित किशोरी देव, श्री ललित किशोरी देव जू की वाणी, सिद्धान्त की साखी (278)
हमारा श्री राधा जू से ऐसा घनिष्ठ संबंध है कि वे हमारे तन, मन और प्राण सहित हमारे रोम-रोम में समाई हुई हैं; और हम भी उनके भीतर ही समाए हुए हैं तथा उनके अंग-संग की केलि-सुखमयी लीला का सदा अवलोकन करते रहते हैं।

