जानें को जतन सों बनौ यहै दाव तेरौ - श्री लाल बलबीर, ब्रज बिनोद, वृन्दावन शतक (50)

जानें को जतन सों बनौ यहै दाव तेरौ - श्री लाल बलबीर, ब्रज बिनोद, वृन्दावन शतक (50)

(कवित्त)
जानें को जतन सों बनौ यहै दाव तेरौ,
याकौ सुख हेरौ पग बाहर न दीजियै। [1]
चौधेहु भुवन ते इकन्त ये विहार भूमि,
लाड़ली लला की रज अंग धार लीजियै॥ [2]
'लाल बलबीर' द्रुम बेली रंग रेलिन में,
संतन के संग बैठ प्रेम रस पीजियै। [3]
कृपा कौं विचारो राधे नाम कौ उचारौ,
ऐसौ वृन्दावन-चन्द में सदॉ ही बास कीजियै॥ [4]

- श्री लाल बलबीर, ब्रज बिनोद, वृन्दावन शतक (50)

हे मन, न जाने कौन से तेरे पुराने यत्न से तेरा यह बनाव बन गया है कि तुझे वृंदावन वास मिल गया है। अब इस वृंदावन के रस को छोड़कर कहीं एक पग भी बाहर न ले जाना। [1]

चौदह भुवनों से अलग, यह वृंदावन ही ऐसी भूमि है जहाँ श्री राधा कृष्ण का एकांत विहार होता है, अतः लाडली लाल की वृंदावन की रज को अपने अंगों में भावपूर्ण लगा ले। [2]

श्री लाल बलबीर जी कहते हैं कि अब तू किसी वृंदावन की लता, पता, द्रुम, बेली आदि में किसी रसिक संत के संग बैठकर, युगल लीला रंग में डूब कर, इस प्रेम रस का पान कर। [3]

ऐसी दुर्लभ कृपा पर विचार कर, राधे नाम का उच्चारण कर, ऐसे अद्भुत वृंदावन में सदा ही वास कर। [4]