सुरतरु कामधेनु, चिंतामणि बारि दिये देव दानी - श्री भगवत रसिक की वाणी, अनन्यरसीकाभरण ग्रन्थ (1.20)

सुरतरु कामधेनु, चिंतामणि बारि दिये देव दानी - श्री भगवत रसिक की वाणी, अनन्यरसीकाभरण ग्रन्थ (1.20)

(राग भैरो)
सुरतरु कामधेनु, चिंतामणि बारि दिये देव दानी।
अष्टसिद्धि नव निद्धि बापुरी कौर करै सनमानी॥ [1]
षड रितु बारह मास, रैन दिन, रहत एक रस सानी।
सेवत स्याम सकाम स्वामिनी स्यामाँ नेह - निधानी॥ [2]
- श्री भगवत रसिक, श्री भगवत रसिक की वाणी, अनन्यरसीकाभरण ग्रन्थ (1.20.9)

कल्पवृक्ष, कामधेनु तथा चिंतामणि को श्री किशोरीजी के ऊपर निछावर करके देवताओ को दान में दे दिया गया है , (क्योकि इन श्री किशोरीजी के सुख की तुलना पर उन कल्पवृक्ष आदि का सुख गनणय है - फिर इस सुख के समक्ष ) बेचारी अष्ट सिद्धियों और नव निधियों के सुख का सम्मान भला कौन करेगा ? [1]

ये (श्रीप्रियाजी) छहों ऋतुओं में, बारहो महीने और रात दिन केवल एक (नित्यविहार) रस में सराबोर रहती है और नये नये मनोरथो से भरे हुए श्रीश्याम इन अपनी स्वामिनी प्रेम निधि श्री किशोरीजी को निरंतर लाड लड़ाते रहते है। [2]