हंस सुता तट बिहरिबौ - श्री ध्रुवदास, बयालीस लीला, भजन कुण्डलिया (1)

हंस सुता तट बिहरिबौ - श्री ध्रुवदास, बयालीस लीला, भजन कुण्डलिया (1)

हंस सुता तट बिहरिबौ, करि वृंदावन वास ।
कुंज-केलि मृदु मधुर रस, प्रेम विलास उपास।। [1]
प्रेम-विलास उपासे रहै इक-रस मन माही।
तिहि सुख कौ सुख कहा कहौं, मेरी मति नाहिं।। [2]
'हित ध्रुव' यह रस अति सरस, रसिकनि कियौ प्रसंस।
मुकतनि छाँड़े चुगत नहिं, मानसरोवर हंस।। [3]

- श्री ध्रुवदास, बयालीस लीला, भजन कुण्डलिया (1)

वृन्दावन रस के अनन्य रसिक उपासक को चाहिये कि वह प्रथमतः दृढ़तापूर्वक विरक्तभाव से वृन्दावन वास करे एवं श्री यमुना तट का सेवन करे। युगल की कुञ्ज-क्रीड़ा वा प्रेम-विलास के मृदु मधुर रस में अनन्य-भाव से तल्लीन रहे एवं प्रेम विलास-मयी रसोपासना का ही सतत चिन्तन करता रहे। [1]
इस रसोपासना के द्वारा उसे अपूर्व आनन्द एवं असीम सुख की उपलब्धि होगी, जिसका वर्णन वाणी द्वारा नहीं किया जा सकता। रसिक महानुभावों द्वारा स्तुत्य एवं अनुमोदित यह वृन्दावन रसोपासना यद्यपि सहज एवं अत्यन्त सरस है, तो भी सर्व सामान्य जीवों के लिए सर्वथा दुरूह है। [2]
कारण कि यह उपासना अनन्य निष्ठा रसमर्मी  भक्तों का ही सुरुचिपूर्ण ध्येय बन पाती है यथा मान-सरोवर निवासी राज-मराल हंस मुक्ताओं [बहुमूल्य रत्न] का आहार छोड़ अन्य कुछ भी ग्रहण नहीं करते, तदवत् ही मर्मी रसिकजन इस नित्य-विहार की उपासना के अतिरिक्त अन्य कोई उपासना स्वीकार नहीं करते। [3]