(राग मलहार)
प्यारी तोहि गिरधर लाल बुलावत।
राधे राधे रटत निश वासर और नहि कछु भावत।। [1]
काम कटक मिलि हरि घेरे है नेक चैन नहिं पावत।
सूरदास प्रभु सौं मिल भामिनि अंग अंग तिमिर नशावत।। [2]
- श्री सूरदास, सूर सागर
हे श्री राधे! आपके प्रियतम, श्री गिरिधर लाल जी आपको बुला रहे हैं। दिन और रात वे केवल "राधे राधे" रटते हैं और कुछ भी उन्हें नहीं भा रहा है। [1]
प्रेम की सेना ने चारों ओर से श्री लाल जी को घेर लिया है और उन्हें एक क्षण को भी चैन नहीं है। श्री सूरदास अब वर्णन करते हैं "इतना सुनते ही लाड़िली जू अब अपने प्रियतम से मिलती हैं तथा लाल जी के हर अंग के अंधकार को दूर कर प्रकाश का संचार करती हैं।"[2]

