कौंन भाग्य पद पंकज पावौं - श्री भोरी सखी, प्रेम की पीर (51)

कौंन भाग्य पद पंकज पावौं - श्री भोरी सखी, प्रेम की पीर (51)

कौंन भाग्य पद पंकज पावौं ।
सजल जलज मृदु सुन्दर शीतल, उर धरि ताप बुझावौं ।। [1]
मृदु सहराय लाय हिय राखौं, हुलरावौ दुलरावौं ।
दृग चकोर नख चंद महा छबि, माधुरी पान करावौं ।। [2]
दृग भरि-भरि अवलोकत निशिदिन, देह गेह बिसरावौं ।
छोड़ौ बहुरि न कबहूँ 'भोरी', दृढ़ गहि हिये बसावौं ।। [3]

- श्री भोरी सखी, प्रेम की पीर (51)

हे श्री राधे ! मेरा ऐसा सौभाग्य कब उदित होगा , जब मुझे आपके चरण-कमलो की संप्राप्ति होगी ? कृपा के जल से पूरित , उन अतिशय कोमल, अति सुन्दर एवं परम शीतल चरण-कमलो को, अपने हृदय में धारण करके, मैं कब अपने हृदय के ताप को परम शांति प्रदान करूंगी ? [1]
उन्हें अपने हाथों से, अत्यंत कोमलता के साथ दबाते हुए , अपने हृदय-मंदिर में सदा - सदा के लिए अवस्थित कर ,उमंग, उमाह एवं उत्साह से भरे हुए हर्ष के साथ, मैं उनका लाड़ - प्यार - दुलार कब करुँगी ? मेरे नेत्र रूपी चकोर आपके श्री चरणों के नख रूपी चंद्र की महा माधुरी से युक्त शोभा का पान कब करेंगे ? [2]
उन्हें रात-दिन अनवरत रूप से देखते हुए, मैं कब अपने शरीर एवं घर-परिवार को पूर्णतः भूल जाऊँगी ? यदि मुझे ऐसा सौभाग्य प्राप्त हुआ तो श्रीहित भोरी सखी जी कहती है कि मैं फिर उन्हें कभी नहीं छोडूंगी और उन्हें कसकर पकड़कर अपने हृदय-मंदिर में सदा-सदा के लिए निवसित कर लूँगी । [3]