(राग मलहार)
पान मुख बीरी राची हरि को रंग सुरंगे ।
ऐसी कृपा सदां हम ऊपर टारो जिन तुम संगे ।। [1]
हरि हम तुम बिन कोन काम के परत प्रेम में भंग ।
परमानन्द दूध में पानी ज्यों मिळवो अंग में अंग ।। [2]
- श्री परमानन्द दास, परमानंद सागर
श्री परमानंद दास कहते हैं "हे हरि, मैंने यह सुगंधित पान की बीरी आपके रूचि के अनुसार बनायी है, जैसी आपको पसंद है। मुझपर ऐसी कृपा कीजिये कि कभी आपका कभी भी वियोग न हो। [1]
हे हरि, आपके बिना मैं और किस काम का हूँ, आपके बिना प्रेम में अन्तराय हो जाता है। श्री परमानंद दास कहते हैं "हे हरि, जैसे दूध में पानी समाया हुआ है, इसी प्रकार आप मुझे नित्य अपना अंग संग प्रदान कीजिये।" [2]

