मयि येषां स्थिरा भक्तिर्भूयसी येषु मत्कृपा ।।
तेषामेव हि धन्यानां मथुरायां भवेद्गतिः ।।
- स्कन्दपुराण (2.17.42) खण्डः 2 (वैष्णवखण्डः) / मार्गशीर्षमासमाहात्म्यम्/अध्यायः 17, पद 42
श्री कृष्ण कहते हैं : जो मेरी मथुरा [ब्रज] भूमि से प्रेम करते हैं [एवं बढ़ाते हैं] उन्हीं का ही मेरे चरणों में प्रगाढ़ प्रेम होता है, और वह ही मेरी नित्य कृपा पाने के अधिकारी हैं ।
तेषामेव हि धन्यानां मथुरायां भवेद्गतिः ।।
- स्कन्दपुराण (2.17.42) खण्डः 2 (वैष्णवखण्डः) / मार्गशीर्षमासमाहात्म्यम्/अध्यायः 17, पद 42
श्री कृष्ण कहते हैं : जो मेरी मथुरा [ब्रज] भूमि से प्रेम करते हैं [एवं बढ़ाते हैं] उन्हीं का ही मेरे चरणों में प्रगाढ़ प्रेम होता है, और वह ही मेरी नित्य कृपा पाने के अधिकारी हैं ।

