आवत जात हौं हार परी - श्री गोविन्द स्वामी, श्री गोविन्द स्वामी जी की वाणी (495)

आवत जात हौं हार परी - श्री गोविन्द स्वामी, श्री गोविन्द स्वामी जी की वाणी (495)

(राग विहागरौ)
आवत जात हौं हारि परी री ।
ज्यों ज्यों प्यारो विनती करि पठवत त्यों त्यों तू गढ़ मान चढ़ी री ।। [1]
तिहारे बीच परे सोई बाबरी हौं चौगान की गेंद भई री ।
' गोविन्द ' प्रभु सौं मिले क्यों न भामिनि सुभग जामनी जात बही री ।। [2]
- श्री गोविन्द स्वामी, श्री गोविन्द स्वामी जी की वाणी (495)

यह बरसाना के मानगढ़ का पद है एवं सुंदर लीला मानगढ़ की प्रस्तुत की गई है । श्री गोविंद स्वामी कहते हैं कि राधारानी का मान शिखर के नीचे से शुरू हुआ और जैसे-जैसे श्यामसुंदर ने मनाया वैसे-वैसे श्रीजी ऊपर चढ़ती आयीं । जब श्रीजी ऊपर चढ़ आयीं तो श्यामसुंदर ने सखियों का सहारा लिया । उन्होंने विशाखा जी व ललिता जी से कहा कि जाओ राधारानी को मनाओ, हमारी तो सामर्थ नहीं है, हम तो थक गये। [1]

श्री ललिता जी व अन्य सखियाँ जब यहाँ आती हैं और श्रीजी से कहती हैं कि आप अपना मान तोड़ दो तो श्रीजी मना कर देती हैं । सखी ठाकुर जी के पास नीचे जाती हैं तो ठाकुर जी फिर ऊपर भेज देते हैं  फिर नीचे जाती हैं तो फिर ऊपर भेज देते हैं तो आखिर में सखी बोली कि हे राधे ! इस गिरी पर मैं कई बार चढ़ी और कई बार उतरी । मैं तो थक गई । आपका मान तो टूटता ही नहीं । इधर से आप भगा देती हो और उधर से वो बार-बार प्रार्थना करते हैं कि जाओ-जाओ । सखी कहती है कि हे राधे ! मैं चौगान की गेंद की तरह से भटक रही हूँ । हे राधे ! जल्दी से श्यामसुंदर से मिलो । ये रात बीती जा रही है। [2]