राधे तेरे नैन कटारे।
उत घायल घुमत ललितादिक इत ससक्त हैं कुँज बिहारी॥ [1]
मुसिकन नौन डारी जिन हा हा निठुर हाथ तेरे जू कहारी।
जय श्री वंशी मीन गहैं पावत ऐसौ न्याव जहाँरी॥ [2]
- श्री वंशी अलि, माधुर्य शत (120)
हे श्री राधे, आपके नैन कटाक्ष अति तीक्ष्ण हैं। एक ओर श्री ललिता जू सहित अन्य सखियाँ जैसे घायल होकर वन वन भटक रही हैं और दूसरी ओर श्री कुंजबिहारी, जो इस प्रकार मूर्छित हो रहे हैं जिससे उनकी श्वासों की गति धीमी हो रही है। [1]
श्री वंशी अली जी कहते हैं "हे श्री राधे, करुणा कर मुस्कुराकर मेरे घाव पर नमक ना डालो, क्यूंकि आपके स्वभाव में निष्ठुरता तो नहीं है। आपने मुझे मछली की तरह पकड़ रखा है, यह मेरे साथ कैसा न्याय है?" [2]
उत घायल घुमत ललितादिक इत ससक्त हैं कुँज बिहारी॥ [1]
मुसिकन नौन डारी जिन हा हा निठुर हाथ तेरे जू कहारी।
जय श्री वंशी मीन गहैं पावत ऐसौ न्याव जहाँरी॥ [2]
- श्री वंशी अलि, माधुर्य शत (120)
हे श्री राधे, आपके नैन कटाक्ष अति तीक्ष्ण हैं। एक ओर श्री ललिता जू सहित अन्य सखियाँ जैसे घायल होकर वन वन भटक रही हैं और दूसरी ओर श्री कुंजबिहारी, जो इस प्रकार मूर्छित हो रहे हैं जिससे उनकी श्वासों की गति धीमी हो रही है। [1]
श्री वंशी अली जी कहते हैं "हे श्री राधे, करुणा कर मुस्कुराकर मेरे घाव पर नमक ना डालो, क्यूंकि आपके स्वभाव में निष्ठुरता तो नहीं है। आपने मुझे मछली की तरह पकड़ रखा है, यह मेरे साथ कैसा न्याय है?" [2]

