यद्यपि धावत विषै कौं - श्री ध्रुवदास, बयालीस लीला, वृन्दावन शत लीला (60)

यद्यपि धावत विषै कौं - श्री ध्रुवदास, बयालीस लीला, वृन्दावन शत लीला (60)

यद्यपि धावत विषै कौं, भजन गहत बिच पानि।
ऐसे वृन्दाविपिन की सरन गही ध्रुव आनि॥
- श्री ध्रुवदास, बयालीस लीला, वृन्दावन शत लीला (60)

श्री ध्रुवदास जी कहते हैं कि मैंने ऐसे वृंदावन की शरण ली है, जहाँ चंचल मन यदि विषयों की ओर दौड़ने भी लगता है, तो भजन बीच में ही उसका हाथ पकड़कर उसे सँभाल लेता है, अर्थात् उसकी रक्षा कर लेता है।