किशोरी मोरी , अब न लगाओ बार।
मांगत भीख कृपा की केवल , खड़ो तिहारे द्वार॥ [1]
रसिकन - मुख अस सुनी दीन को , आदर येहि दरबार।
देर होत अंधेर नहीं बस , इहै रह्यो आधार॥ [2]
देर भये जनि जानेहु तजिहौं , हौं जड़ हठी गमार।
कहिहौं नहिँ ' कृपालु ' काहू सों , आ जाइय इक बार॥ [3]
- जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज, प्रेम रस मदिरा, दैन्य माधुरी (33)
हे अलबेली राधिके ! अब देर न करो | मैं तुम्हारे द्वार पर खड़ा होकर तुम्हारी कृपा की भिक्षा माँग रहा हूँ | [1]
रसिकों के मुख से सुना है कि तुम्हारे दरबार में दीनों का सदा सम्मान हुआ करता है | फिर भी जो देर हो रही है इसे ‘देर होती है अन्धेर नहीं’, इस लोकोक्ति के अनुसार समझकर विश्वास पूर्वक आशा लगाये बैठा हूँ | [2]
किशोरी जी ! तुम्हारी कृपा पाने में कितनी ही देर क्यों न हो, पर तुम यह न समझना कि मैं देर होने के कारण तुम्हारा अवलम्ब छोड़ दूँगा | मैं पक्का जड़, हठी एवं मूर्ख हूँ | ‘श्री कृपालु जी’ कहते हैं कि हे किशोरी जी! चुपके से आप मुझे दर्शन दे जाओ | यदि तुम्हें यह भय हो कि तुम और लोगों से कह दोगे, तो मैं वचन देता हूँ कि मैं किसी से नहीं कहूँगा | [3]
मांगत भीख कृपा की केवल , खड़ो तिहारे द्वार॥ [1]
रसिकन - मुख अस सुनी दीन को , आदर येहि दरबार।
देर होत अंधेर नहीं बस , इहै रह्यो आधार॥ [2]
देर भये जनि जानेहु तजिहौं , हौं जड़ हठी गमार।
कहिहौं नहिँ ' कृपालु ' काहू सों , आ जाइय इक बार॥ [3]
- जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज, प्रेम रस मदिरा, दैन्य माधुरी (33)
हे अलबेली राधिके ! अब देर न करो | मैं तुम्हारे द्वार पर खड़ा होकर तुम्हारी कृपा की भिक्षा माँग रहा हूँ | [1]
रसिकों के मुख से सुना है कि तुम्हारे दरबार में दीनों का सदा सम्मान हुआ करता है | फिर भी जो देर हो रही है इसे ‘देर होती है अन्धेर नहीं’, इस लोकोक्ति के अनुसार समझकर विश्वास पूर्वक आशा लगाये बैठा हूँ | [2]
किशोरी जी ! तुम्हारी कृपा पाने में कितनी ही देर क्यों न हो, पर तुम यह न समझना कि मैं देर होने के कारण तुम्हारा अवलम्ब छोड़ दूँगा | मैं पक्का जड़, हठी एवं मूर्ख हूँ | ‘श्री कृपालु जी’ कहते हैं कि हे किशोरी जी! चुपके से आप मुझे दर्शन दे जाओ | यदि तुम्हें यह भय हो कि तुम और लोगों से कह दोगे, तो मैं वचन देता हूँ कि मैं किसी से नहीं कहूँगा | [3]

