गिरि तैं ऊँचे रसिक - श्रीमहाकवी बिहारी लाल, बिहारी सतसई

गिरि तैं ऊँचे रसिक - श्रीमहाकवी बिहारी लाल, बिहारी सतसई

गिरि तैं ऊँचे रसिक, मन बूड़े जहाँ हजारु।
वहै सदा पसु-नरनु कौं, प्रेम-पयोधि पगारु॥

- श्रीमहाकवी बिहारी लाल, बिहारी सतसई

पर्वत से भी ऊँचे रसिकों के मन जहाँ हजारों बार डूब चुके हैं, वही प्रेम का समुद्र  संसारी और पशुवत बुद्धि वाले लोगों के लिए सदा उथला ही रहता है—इतना उथला कि उसमें उनके पैर भी नहीं डूबते।