सब-सुख-सोभा-मूल बृंदावन धन मेरे।
राधा-मोहन गाउँ न्हाउँ जमुना साँझ-सबेरे॥ [1]
प्रेममंडली दरसन पाउँ धीरसमीर बेनुबट नेरे।
आनँदघन झर सदा लगाउँ नितबिहार-हित हेरे॥ [2]
- श्री आनंदघन जी, घनानंद ग्रंथावली, पदावली (759)
श्री आनंदघन कह रहे है "समस्त सुख तथा शोभा का मूल श्री वृन्दावन धाम ही मेरा जीवन धन है, जहाँ नित्य श्री राधा मोहन का नाम गाऊंगा और प्रातः संध्या श्री यमुना जी में स्नान करूँगा। [1]
श्री राधा मोहन की विहार स्थली धीरसमीर तथा बंशीवट के निकट रसिक संतों का दर्शन पाउँगा। श्री आनंदघन कह रहे है "मैं नित्य ही श्यामा श्याम के लिए प्रेम पूर्वक आंसू बहाकर, अपने ह्रदय से श्री श्यामा श्याम के नित्य विहार का प्रेम पूर्वक चिंतन करूँ”। [2]
राधा-मोहन गाउँ न्हाउँ जमुना साँझ-सबेरे॥ [1]
प्रेममंडली दरसन पाउँ धीरसमीर बेनुबट नेरे।
आनँदघन झर सदा लगाउँ नितबिहार-हित हेरे॥ [2]
- श्री आनंदघन जी, घनानंद ग्रंथावली, पदावली (759)
श्री आनंदघन कह रहे है "समस्त सुख तथा शोभा का मूल श्री वृन्दावन धाम ही मेरा जीवन धन है, जहाँ नित्य श्री राधा मोहन का नाम गाऊंगा और प्रातः संध्या श्री यमुना जी में स्नान करूँगा। [1]
श्री राधा मोहन की विहार स्थली धीरसमीर तथा बंशीवट के निकट रसिक संतों का दर्शन पाउँगा। श्री आनंदघन कह रहे है "मैं नित्य ही श्यामा श्याम के लिए प्रेम पूर्वक आंसू बहाकर, अपने ह्रदय से श्री श्यामा श्याम के नित्य विहार का प्रेम पूर्वक चिंतन करूँ”। [2]

