(सवैया)
लाड़िली लाल लसै लखिए, अलि पुंजन कुंजनि में छवि गाढ़ी।
ऊजरी ज्यो बिजुरी सी जुरी, चहुँ गूजरी केलि कला सम काढी॥ [1]
त्यों रसखान न जानि परै, सुखमा तिहुँ लोकनि की अति बाढ़ी।
लालन बाल लिये बिहरै, छहरै सिर मोरपखी ठग ठाढ़ी॥ [2]
- श्री रसखान, रसखान रत्नावली
कुंजों में सखियों के समूह के बीच जब लाड़िली-लाल (राधा-कृष्ण) की छवि दिखती है, तो वह अत्यंत गाढ़ी सुंदरता बिखेरती है। उनकी शोभा मानो उज्जवल बिजली की तरह कौंध रही हो, और चारों ओर गूँजता हुआ प्रेम-विहार मानो कलात्मकता की चरम सीमा को छू रहा हो। [1]
रसखान कहते हैं—उस अनुपम छवि की तुलना में तीनों लोकों की सारी शोभा भी फीकी पड़ती है। वह मोहन, सिर पर मोरपंख सजाए, श्री राधा को साथ लिए, निकुंजों में प्रेम-विहार करते हुए खड़े हैं और अपनी रूप-माधुरी से सबका मन चुरा रहा है। [2]
लाड़िली लाल लसै लखिए, अलि पुंजन कुंजनि में छवि गाढ़ी।
ऊजरी ज्यो बिजुरी सी जुरी, चहुँ गूजरी केलि कला सम काढी॥ [1]
त्यों रसखान न जानि परै, सुखमा तिहुँ लोकनि की अति बाढ़ी।
लालन बाल लिये बिहरै, छहरै सिर मोरपखी ठग ठाढ़ी॥ [2]
- श्री रसखान, रसखान रत्नावली
कुंजों में सखियों के समूह के बीच जब लाड़िली-लाल (राधा-कृष्ण) की छवि दिखती है, तो वह अत्यंत गाढ़ी सुंदरता बिखेरती है। उनकी शोभा मानो उज्जवल बिजली की तरह कौंध रही हो, और चारों ओर गूँजता हुआ प्रेम-विहार मानो कलात्मकता की चरम सीमा को छू रहा हो। [1]
रसखान कहते हैं—उस अनुपम छवि की तुलना में तीनों लोकों की सारी शोभा भी फीकी पड़ती है। वह मोहन, सिर पर मोरपंख सजाए, श्री राधा को साथ लिए, निकुंजों में प्रेम-विहार करते हुए खड़े हैं और अपनी रूप-माधुरी से सबका मन चुरा रहा है। [2]

