निहचै भजै बिहार कों, और न जानैं देव।
तन मन अर्पन रसिक कों, निर्भय ह्वै करि सेव॥
- श्री ललित किशोरी देव, श्री ललित किशोरी देव जू की वाणी, सिद्धांत की साखी (290)
अपने तन, मन और सर्वस्व को रसिक गुरु को अर्पण करके, निर्भय होकर नित्य-विहार का ऐसी दृढ़ अनन्यता से भजन करो कि स्वप्न में भी किसी अन्य देवता का परिचय न हो।
तन मन अर्पन रसिक कों, निर्भय ह्वै करि सेव॥
- श्री ललित किशोरी देव, श्री ललित किशोरी देव जू की वाणी, सिद्धांत की साखी (290)
अपने तन, मन और सर्वस्व को रसिक गुरु को अर्पण करके, निर्भय होकर नित्य-विहार का ऐसी दृढ़ अनन्यता से भजन करो कि स्वप्न में भी किसी अन्य देवता का परिचय न हो।

