देखत छबीली जू की छबि - श्री ध्रुव दास - बयालीस लीला, श्रिंगार शत 1 (23)

देखत छबीली जू की छबि - श्री ध्रुव दास - बयालीस लीला, श्रिंगार शत 1 (23)

देखत छबीली जू की छबि छके छबि-निधि,
ऐसी छबि देखि आली दृग नहिं टारियै। [1]
अलबेली चितवनि हँसनि ललन पर,
मानौं सुख पुंज रंग के प्रवाह ढारियै॥ [2]
छिन-छिन नई-नई छवि की तरंग छटा,
बिवस करत प्रान कैसे कैं सँभारियै। [3]
'हित ध्रुव' प्यारी जू के चरन चिह्ननि पर,
कोटि-कोटि रति दुति मोहनी सी वारियै॥ [4]

- श्री ध्रुव दास - बयालीस लीला, श्रिंगार शत 1 (23)

छबिमयी लाड़िली की मनोरम छबि का दर्शन करके सौन्दर्य-धाम प्रियतम अपलक दृष्टि से उन्हें देखते ही रह जाते है । [1] तब ऐसा लगता है मानो अलबेली प्रिया अपनी चितवन एवं मृदु मुसकान के माध्यम से श्री लाल पर सुख-समूह के प्रवाह उँडेल रही हो । [2]
श्री लाड़िली की उज्ज्म्भमाण छबि-छटा प्रियतम के प्राणों को उद्वेलित एवं प्रेम-विवश करती रहती है । [3]
श्री धुव्रदास जी कहते है कि ऐसी प्रिया के चरण-चिन्हों पर कोटि-कोटि रति एवं मोहनी की प्रभा न्यौछावर है । [4]