गत्वा कलिन्दतनयाविजनावतार मुद्वर्तयन्त्यमृत मंगमनंगजीवम्।
श्रीराधिके तव कदा नवनागरेन्द्रं पश्यामि मग्न नयनं स्थित मुच्चनीपे ।।
- श्री हित हरिवंश महाप्रभु, श्री राधा सुधा निधि (23)
हे श्री राधे ! श्री यमुनाजी के निर्जन घाट पर जाकर कामदेव को जीवित कर देने वाले आपके अमृतमय श्री अंगों को उबटन लगाती हुई मैं, ऊँचे कदम्ब वृक्ष पर बैठे हुए मग्न नेत्रों वाले आपके नवनागर शिरोमणि (श्रीश्यामसुन्दर) को कब देखूँगी ?
श्रीराधिके तव कदा नवनागरेन्द्रं पश्यामि मग्न नयनं स्थित मुच्चनीपे ।।
- श्री हित हरिवंश महाप्रभु, श्री राधा सुधा निधि (23)
हे श्री राधे ! श्री यमुनाजी के निर्जन घाट पर जाकर कामदेव को जीवित कर देने वाले आपके अमृतमय श्री अंगों को उबटन लगाती हुई मैं, ऊँचे कदम्ब वृक्ष पर बैठे हुए मग्न नेत्रों वाले आपके नवनागर शिरोमणि (श्रीश्यामसुन्दर) को कब देखूँगी ?

