श्री नारायण स्वामी जी का जीवन परिचय  - वृंदावन के रसिक संत

श्री नारायण स्वामी जी का जीवन परिचय - वृंदावन के रसिक संत

जन्म एवं बाल्यकाल : 
श्रीनारायण स्वामी का जन्म वि० सं० 1886 के लगभग पंजाब के रावलपिण्डी जिले में एक सारस्वत - ब्राह्मण परिवार में हुआ था। वे बाल्यावस्था से ही सन्तों और भगवद्भक्तों में विशेष अभिरुचि रखते थे, उनका मन घर पर बहुत कम लगता था। वृन्दावन की सरस महिमा की कथा सुनकर उन्हें समय - समय पर रोमांच हो आता था। 

शिक्षा एवं आध्यात्मिक जीवन : 
श्रीनारायण स्वामी ने काशी में शिक्षा ग्रहण कर वहीं "मुकुन्द स्वामी" नाम के एक सन्यासी से सन्यास दीक्षा ग्रहण ले ली थी। उनके गुरु ज्ञानी होते हुए भी परम भक्त थे, और उन्ही की प्रेरणा से वे वृन्दावन आए थे, जैसा की उनके ग्रंथ 'व्रज-विहार' के मंगलाचरण के पद से जान पड़ता है। पद इस प्रकार है -

बंदौ श्रीगुरु चरण कमलवर।
जिनको नाम सकल मंगलनिधि ध्यान धरत अघ रहत न पलभर॥
परम उदार सार निगमागम भक्ति ज्ञानकी खान मनोहर।
नारायण मोहि दीन जानीके वास दियो वृन्दावन गहि कर॥

वृन्दावन आगमन :
वि० सं० 1900 में उनका मन श्री राधा कृष्ण की दर्शनमाधुरी के लिए आकुल हो उठा एवं वे वृन्दावन को चल पड़े। श्री राधा कृष्ण का रूप ऐसा है कि एक बार भी उसका रसास्वादन करने वाला उन्हीं का हो जाता है। ब्रज - भूमि में आते ही , वृन्दावन के प्रेम - देवता - श्री राधा कृष्ण के लीला - कुंजों का दर्शन होते ही उन्होंने सावधानी से अपने मन को समझाया - ' मूढ़ ! अब तुम्हें कहीं और नहीं भटकना है। श्री राधा कृष्ण के परिचय- मात्र से ही तुम भवसागर से पार उतर जाओगे। इस समय उनकी अवस्था यौवन के प्रवेश - द्वार पर थी , उनका रूप - लावण्य अत्यन्त मनमोहक था। 

श्रीनारायण स्वामी प्रायः केशीघाट पर खपाटिया बाबा के घेरे में यमुना - तट पर रहते थे। उन्होंने जीविका निर्वाह के लिए लालाबाबू के मन्दिर कार्यालय में नौकरी कर ली। नौकरी के बदले वे मंदिर से वेतन न लेकर मात्र प्रसाद ग्रहण करते। वे दिनभर काम करते थे और रात को रासलीला देखते तथा श्री राधा कृष्ण के रूप - रस की सुधा - पीकर, मन्दिरों में दर्शन करते और लौटने पर नित्य पद रचना किया करते थे। 

उन्हें श्री राधा कृष्ण का स्मरण सदा बना रहता था। वे मस्त होकर वृन्दावन की गली - गली में श्री राधा कृष्ण का दर्शन पाने के लिए विचरण किया करते थे। उनके लिए स्तुति और निन्दा समान थी। धूप और छाया के भेद - दृष्टि का अस्तित्व उनके लिए समाप्त हो चुका था। श्री राधा कृष्ण के प्रेमी तो होते ही ऐसे हैं। वे डंके की चोट घोषणा किया करते थे कि जब तक नन्दकुमार ' दृष्टि में नहीं आते , तभी तक ब्रह्मज्ञानी ब्रह्म के द्वार स्वरूप का विवेचन कर सकता है। उनको देखते ही, उनकी कृपा - दृष्टि की शीतल छाया में आते ही जीव ब्रह्मज्ञान भूल जाते हैं। उनका मन भगवत्साक्षात्कार की सुधा में सराबोर हो जाता है। वे कभी - कभी विरहोन्माद में गा उठ ते थे-

साँवरे क्यों मोसौं रिस मानी। 
तेरे काज घरबार त्यागि कै गलियन फिरत दिवानी॥
लोक - लाज, कुलरीति प्रीति -जग इनहूँ कौं दियौ पानी। 
' नारायण ' अब तो हँसि चितवौं , एरे रूप गुमानी॥ 

रास मण्डलियों में उनकी बड़ी प्रतिष्ठा थी। रासधारी उनके रचे पद गाया करते थे। कुछ दिन बाद नौकरी छोड़कर उन्होंने पूर्ण वैराग्य ले लिया। वे बड़े सरल और उदार स्वभाव के थे। कभी धातु- स्पर्श नहीं करते थे। कामिनी - कञ्चन की ओर दृष्टि उठाना महापातक मानते थे। वृन्दावन की आचार - विचार का उन्होंने आजीवन ध्यान पूर्वक पालन किया तथा व्रज की पवित्र भूमि पर वे कभी शौच नहीं जाते थे। 
उन्होंने 'ब्रज - विहार' नामक भक्त - रस के एक ग्रन्थ की रचना की थी। उसमें श्री राधा कृष्ण की लीलाओं का श्रृंगार - रस से ओत - प्रोत सरस वर्णन हुआ है। कहीं - कहीं अनुभव के भी सरस पदों का दर्शन होता है। उनके पद और दोहे बड़े ही उपदेशप्रद और सरस हैं। वे सदा प्रेम - सिन्धु में निमग्न रहते थे। 

गोवर्धन वास :
वि० सं० १९५५ में अपने शेष जीवन मे स्वामीजी जन-कोलाहल से ऊबकर गोवर्धन चले गए थे। एक दिन उन्हें कुसुम सरोवर पर जुगल-सरकार श्री राधा कृष्ण के दर्शन हुए। उनके पीछे दौड़ते वे गोवर्धन तक चले गए, पर वे हाथ न आए। हारकर एक इमली के पेड़ के नीचे बैठ गए। थोड़ी देर में उन्होने फिर श्यामाश्यम को गोवर्धन से लौटे देखा, तो वे उनके पीछे भागते-भागते कुसुम सरोवर तक गए, फिर भी वे हाथ न आए। उनके पीछे दौड़-भाग करते थक जानेके कारण उन्हें विश्राम चाहिए था। पर उन्हें विश्राम कहाँ ? वे कभी सिसकियाँ भर-भर रोते, कभी मूर्छित हो गिर पड़ते। सिसकियाँ भरना और मूर्छित हो जाना, यही तो है प्रेम-पथ के पथिक का विश्राम -

नारायण घाटी कठिन, जहाँ नेहको धाम।
विकल मूर्छा सिसकिबौ, यह मगमें विश्राम॥

जबसे स्वामीजी को कुसुम सरोवर पर जुगल के दर्शन हुए, वे उसके पास उद्धवकुण्ड पर एक चौबारे में रहने लगे। वहीं फाल्गुन कृष्णा एकादशी वि० सं० १९५७ के दिन कुसुम - सरोवर पर उद्धवजी के मन्दिर में उनका सदा के लिए लीला - प्रवेश हो गया। वास्तव में वे महान रसिक थे। उनके पदों को पढ़ने से भागवती - निष्ठा और भक्ति की अभि वृद्धि में बड़ा बल मिलता है।

ग्रंथ रचना :
श्री नारायण स्वामिकी अधिकांश रचनाएँ 'व्रज-विहार' नामक ग्रंथ में संकलित है। इस ग्रंथ में ४३ रास-लीलाएँ भी हैं, जो उनके द्वारा रचित हैं। स्वामीजी के रचित दोहे 'अनुराग रस' नामक ग्रंथ मे संकलित हैं। उनका प्रसिद्ध दोहा:

दो बातन को भूल मत जो चाहत कल्याण,
नारायण एक मौत को, दूजो श्री भगवान् ||
- श्री नारायण स्वामी - अनुराग रस (81)

दो बातों को संसार में कभी नहीं भूलना चाहिए अगर आप अपना कल्याण चाहते हो, एक तो मौत को और दूसरा भगवान को।