श्री हरिप्रिया नित हीय में लसौ - श्री हरिव्यास देवाचार्य, महावाणी, उत्साह सुख (6)

श्री हरिप्रिया नित हीय में लसौ - श्री हरिव्यास देवाचार्य, महावाणी, उत्साह सुख (6)

(दोहा)
श्री हरिप्रिया नित हीय में, लसौ बसौ सब काल।
अति सुन्दरबर सोहनी, बानिक मोहनलाल॥

(पद)
मनमोहै (री) सोहै अति सुन्दर बानिक मोहनलाल की।
झुकनि छबीली रंग रँगीली पगिया गोर भाल की॥ [1]
नवल नासिका नथ मोतीकी झलकनि रूप रसाल की।
श्रीहरिप्रिया बसौ नित हियमें चितवनि नैन बिसाल की॥ [2]

- श्री हरिव्यास देवाचार्य, महावाणी, उत्साह सुख (6)

(दोहा)
श्री हरि एवं प्रिया की यह झाँकी ऐसे ही सुशोभित होकर हमारे हृदयों में सदा काल बसी रहे। इस समय श्री मोहनलाल की रूप-माधुरी की छवि अत्यंत सुन्दर है; हमारे मनों को मोहन करने वाली है।

(पद)
इस समय की मोहन लाल की रूप माधुरी की सुंदरता मेरे मन को मोहन करने वाली हैं । प्यारे की छबि से भरी हुई रंग रंगीली पाग जो झुक कर इस समय प्यारी जू के गोरे भाल पर आई हुई हैं , कैसी सुन्दर लगती हैं । [1]

प्यारी जी की नवल नासिका पर सुशोभित उस नथ के मोती की कैसी शोभा हो रही हैं जिसमें प्यारे का रसीला रूप झलमला रहा हैं । श्रीहरि प्रिया जू यह प्रार्थना करती हैं, कि रसिक दम्पति के विशाल नेत्र कमलों की इस समय की परस्पर चितवन सदा मेरे हृदय में बसी रहे । [2]