कहँ तू कहँ वृन्दाविपिन - श्री ध्रुवदास, बयालीस लीला, वृन्दावन शत लीला (62)

कहँ तू कहँ वृन्दाविपिन - श्री ध्रुवदास, बयालीस लीला, वृन्दावन शत लीला (62)

कहँ तू कहँ वृन्दाविपिन, आनि बन्यौ भल बान।
यह बात जिय समुझि कै, अपनौ छाँड़ सयान॥

- श्री ध्रुवदास, बयालीस लीला, वृन्दावन शत लीला (62)

हे मन! कहाँ विषय-वासना में रमा हुआ तू, और कहाँ परम सच्चिदानन्दघन वृंदावन। हित-कृपा से ऐसा सुंदर सुयोग प्राप्त हुआ है; अतः इस बात को भली-भाँति समझकर अपनी चतुराई छोड़ दे और वृंदावन का सेवन कर।