द्वार पतित इक आयो री किशोरी राधे - जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज, प्रेम रस मदिरा, दैन्य माधुरी (51)

द्वार पतित इक आयो री किशोरी राधे - जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज, प्रेम रस मदिरा, दैन्य माधुरी (51)

द्वार पतित इक आयो री किशोरी राधे ।
मांगत भीख प्रेम की यद्यपि, पात्र संग नहिं लायो री किशोरी राधे ।। [1]
विष्ठा-विषय हेतु नित अब लौं, शूकर ज्यों भटकायो री किशोरी राधे ।
संतन कह्यो नेकु नहिं मान्यो, कियो सदा मनभायो री किशोरी राधे ।। [2]
जानि जानि अपराध करत नित, नेकहुँ नाहिँ लजायो री किशोरी राधे ।
नर तनु हरि हरिजन अनुकंपा, सब ही पाय गॅमायो री किशोरी राधे ।। [3]
तुम बिनु हेतु कृपालु 'कृपालुहिं', पुनि काहे बिसरायो री किशोरी राधे । [4]

- जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज, प्रेम रस मदिरा, दैन्य माधुरी (51)

हे राधे ! तुम्हारे द्वार पर एक महान् पापी निष्काम-प्रेम की भिक्षा माँगने आया है, किन्तु साथ में शुद्ध अन्त:करण रूपी पात्र नहीं लाया है। [1]
हे किशारी जी! अनादिकाल से सांसारिक विषय वासना रूपी विष्ठा के लिए अब तक शूकर की भाँति चौरासी-लाख योनियों में भटकता रहा महापुरुषों के बताये हुए आदेशों को स्वप्न में भी नहीं माना तथा सर्वदा मनमाना ही किया। [2]
समझ-बूझ कर भी निरन्तर पापों को करते हुए मुझे कभी जरा भी लज्जा नहीं आयी। मानव-देह, तुम्हारी एवं तुम्हारे जनों की अकारण कृपा, इन सब को पाकर भी खो दिया। [3]
श्री कृपालु जी कहते हैं कि हे किशोरी जी ! तुम बिना कारण ही कृपा करने वाली हो,फिर मुझ पतित को क्यों भुला दिया। [4]