जन्म एवं बाल्यकाल :
श्री ललितमोहिनीदास जी श्रीहरिराम व्यासजीके वंशज थे । इनका जन्म सं . १७८० में ओरछा में हुआ था ।
आध्यात्मिक जीवन :
श्री ललितमोहिनीदास जी युवावस्था में ही संसार छोड़ कर वृन्दावन आ गये थे और 'श्रीललित किशोरीदासजी' से दीक्षा लेकर भजन करने लग गये थे । सं . १८२३ से ललित किशोरीदासजी के अंतर्धानके पश्चात् ये उनके स्थानपर टटिया - स्थानके महन्त और हरिदासी सम्प्रदाय के अष्टम आचार्य हुए ।
श्री ललित मोहनीदासजी अपनी विरक्ताई और साधु - सेवा के लिये प्रसिद्ध थे । उनका सिद्धांत था कि तन , मन , धन सब साधु - सेवा के लिये है जैसा कि उन्होंने लिखा है:
सब ही संत हैं रस भरे, सब ही रस की खानि।
रंगमहल में बिहारी बिहारिन, बिहरैं रसिक सुजान॥
एक दिन श्रीस्वामी ललितमोहिनी देव जी संत-सेवा के पश्चात प्रसाद पाकर विश्राम कर रहे थे,किन्तु उनका मन कुछ उद्विग्न सा था। वे बार-बार आश्रम के प्रवेश द्वार की तरफ देखते, वहाँ जाते और फिर लौट आते। वहाँ रह रहे संत ने पूंछा – स्वामी जी ! किसको देख रहे है आपको किसका इन्तजार है?
स्वामी जी बोले – एक मुसलमान भक्त है श्री युगल किशोर जी की मूर्तियाँ लाने वाला है उसका इन्तजार कर रहा हूँ। इतने मे वह मुसलमान भक्त सिर पर एक घड़ा लिए वहाँ आ पहुँचा और दो मूर्तियों को ले आने की बात कही। श्री स्वामी जी के पूंछने पर उसने बताया, कि डींग के किले में भूमि कि खुदाई चल रही है।
मै वहाँ एक मजदूर के तौर पर खुदाई का काम कई दिन से कर रहा हूँ। कल खुदाई करते में मुझे यह घड़ा दीखा तो मैंने इसे मुहरो से भरा जान कर फिर दबा दिया ताकि साथ के मजदूर इसे ना देख ले। रात को फिर मै इस कलश को घर ले आया खुदा का लाख लाख शुक्र अदा करते हुए कि अब मेरी परिवार के साथ जिंदगी शौक मौज से बसर होगी घर आकर जब कलश में देखा तो इससे ये दो मूर्तियाँ निकली, एक फूटी कौड़ी भी साथ ना थी।
स्वामी जी – इन्हें यहाँ लाने के लिए तुम्हे किसने कहा ?
मजदूर – जब रात को मुझे स्वप्न में इन प्रतिमाओ ने आदेश दिया कि हमें सवेरे वृंदावन में टटिया स्थान पर श्री स्वामी जी के पास पहुँचा दो इसलिए में इन्हें लेकर आया हूँ।
स्वामी जी ने मूर्तियों को निकाल लिया और उस मुसलमान भक्त को खाली घड़ा लौटते हुए कहा भईया ! तुम बड़े भाग्यवान हो भगवान तुम्हारे सब कष्ट दूर करेगे। वह मुसलमान मजदूर खाली घड़ा लेकर घर लौटा, रास्ते में सोच रहा था कि इतना चमत्कारी महात्मा मुझे खाली हाथ लौटा देगा – मैंने तो स्वप्न में भी ऐसा नहीं सोचा था। आज की मजदूरी भी मारी गई। घर पहुँचा एक कौने में घड़ा धर दिया और उदास होकर एक टूटे मांझे पर आकर सो गया।
पत्नी ने पूँछा – हो आये वृंदावन ?
क्या लाये फकीर से ?
भर दिया घड़ा अशर्फिर्यो से ?
क्या जवाव देता इस व्यंग का ?
उसने आँखे बंद करके करवट बदल ली। पत्नी ने कोने में घड़ा रखा देखा तो लपकी उस तरफ देखती है कि घड़ा तो अशर्फियों से लबालव भरा है, आनंद से नाचती हुई पति से आकर बोली मियाँ वाह ! इतनी दौलत होते हुए भी क्या आप थोड़े से मुरमुरे ना ला सके बच्चो के लिए ? अशर्फियों का नाम सुनते ही भक्त चौककर खड़ा हुआ और घड़े को देखकर उसकी आँखों से अश्रु धारा बह निकली। बोला मै किसका शुक्रिया करू, खुदा का, या उस फकीर का जिसने मुझे इस कदर संपत्ति बख्शी। फिर इन अशर्फिर्यो के बोझे को सिर पर लाद लाने से भी मुझे बरी रखा कैसी रहमत ?
श्री ललितमोहनदास जी ने सन 1823 में इस स्थान पर ठाकुर श्री मोहिनी बिहारी जी को प्रतिष्ठित किया था। तभी चारों ओर बाँस की टटिया लगायी गई थी, तभी से यहाँ के सेवा पुजाधिकारी विरक्त साधू ही होते चले आ रहे हैं। उनकी विशेष वेशभूषा भी है।
श्री ललितमोहिनिदास जी के समय इस स्थान का यह नियम था कि जो भी आटा-दाल-घी दूध भेंट में आवे उसे उसी दिन ही ठाकुर भोग ओर साधू सेवा में लगाया जाता था। संध्या के समय के बाद सबके बर्तन खाली करके धो-माज के उलटे करके रख दिए जाते थे, कभी भी यहाँ अन्न सामग्री कि कमी ना रहती थी। एक बार दिल्ली के यवन शासक ने जब यह नियम सुना तो परीक्षा के लिए अपने एक हिंदू कर्मचारी के हाथ एक पोटली में सच्चे मोती भर कर सेवा के लिए संध्या के बाद रात को भेजे।
श्री महंत जी बोले - वाह खूब समय पर आप भेंट लाये हैं। महंत जी ने तुरंत उन्हें खरल में पिसवाया ओर पान बीडी में भरकर श्री ठाकुर जी को भोग में अर्पण कर दिया, कल के लिए कुछ नहीं रखा। ऐसे संग्रह रहित विरक्त थे श्री महंत जी। उनका यह भी नियम था कि चाहे कितने मिष्ठान व्यंजन पकवान भोग लगे स्वयं उनमें से प्रसाद रूप में कणिका मात्र ग्रहण करते, सब पदार्थ संत सेवा में लगा देते और स्वयं मधुकरी करते।
श्री ललित मोहिनी देव का प्रताप इतना बढ़ा-चढ़ा था की तत्कालीन ग्वालियर-नरेश सिन्धिया ने उनकी पालकी उठाकर अपनी भक्ति का परिचय देना चाहा, किन्तु स्वामीजी ने रोक दिया।
श्री ललित मोहिनी देव ही टटीया स्थान के "समाज" की वर्तमान गायन-प्रणाली के प्रवर्तक थे। तत्कालीन मुसलमान शासक ने आपसे प्रभावित होकर तीन इलाके भेंट किए, जिनकी वार्षिक आय आज के युग में करोड़ों रुपये होती। भेंट की सनद में यह भी लिखा है की कोई भी राजकर्मचारी इसमें किसी प्रकार की बाधा न देकर सारा लगान वसूल करके स्वामीजी की सेवा में पहुंचाए। मालगुजारी वसूल करना या स्वीकार करना तो जहाँ-तहाँ रहा, श्री स्वामी ललित मोहिनी देव जी ने इसकी ओर आँख उठाकर भी न देखा। और वह सनद केवल कागज मात्र रह गई, जो आज भी टटीया स्थान में सुरक्षित है।
श्री ललित मोहिनी देव का प्रताप इतना बढ़ा-चढ़ा था की तत्कालीन ग्वालियर-नरेश सिन्धिया ने उनकी पालकी उठाकर अपनी भक्ति का परिचय देना चाहा, किन्तु स्वामीजी ने रोक दिया।
श्री ललित मोहिनी देव ही टटीया स्थान के "समाज" की वर्तमान गायन-प्रणाली के प्रवर्तक थे। तत्कालीन मुसलमान शासक ने आपसे प्रभावित होकर तीन इलाके भेंट किए, जिनकी वार्षिक आय आज के युग में करोड़ों रुपये होती। भेंट की सनद में यह भी लिखा है की कोई भी राजकर्मचारी इसमें किसी प्रकार की बाधा न देकर सारा लगान वसूल करके स्वामीजी की सेवा में पहुंचाए। मालगुजारी वसूल करना या स्वीकार करना तो जहाँ-तहाँ रहा, श्री स्वामी ललित मोहिनी देव जी ने इसकी ओर आँख उठाकर भी न देखा। और वह सनद केवल कागज मात्र रह गई, जो आज भी टटीया स्थान में सुरक्षित है।
शिष्य परम्परा :
श्री ललितमोहिनीदासजी के अनेक शिष्य हुए । उनमें 'श्रीभगवतरसिकजी' एवं 'श्रीचतुरदासजी' मुख्य थे । श्रीचतुरदासजी उनके बाद टटिया - स्थान के महंत हुए।
रचित ग्रन्थ एवं लीलाएं :
श्री ललितमोहिनीदासजी की वाणी अष्टाचार्यो की वाणी में संकलित है । इसमें सिद्धांत और रस के पदों के साथ कुछ साखियाँ भी है । प्रायः इनकी वाणी श्री ललित मोहिनी देव ज़ू की वाणी के नाम से प्रसिद्ध है ।

