कबै रसीली कुंज में - श्री नागरीदास जी (महाराज सावंत सिंह जी)

कबै रसीली कुंज में - श्री नागरीदास जी (महाराज सावंत सिंह जी)

कबै रसीली कुंज में, हौं करि हौं परवेश।
लखि-लखि लता जु लहलही, चित्त ह्वै गो आवेश॥
- श्री नागरीदास जी (महाराज सावंत सिंह जी), श्री नागरीदास जी की वाणी, मनोरथ मञ्जरी (4)

मैं कब उन वृंदावन की रसीली कुंजों में प्रवेश करूँगा, जहाँ लहलहाती हुई लताओं को देखकर मेरा हृदय युगल के प्रेम-रंग में डूबकर मूर्छित हो जाएगा?