(राग पूर्वी एवं राग मालकौंस)
रहै दोऊ बदन निहार निहार।
फुलवा बीनत श्याम सखन संग इत श्यामा सुकुमार॥ [1]
लता-तरुन में रह गये इक टक कौन सके निर्वार।
नागरिया लगे नैन दुहुँनि के बड़े ठगन ठगवार॥ [2]
- श्री नागरीदास (महाराज सावंत सिंह जी), श्री नागरीदास जी की वाणी, उत्सव माला (41)
श्री नागरीदास कहते हैं, "रमणीक श्री वृन्दावन मे श्री श्यामसुंदर अपने सखाओं के संग पुष्प चयन कर रहे हैं एवं उसी समय वहाँ अति सुकुमार श्री श्यामा जू आ गईं और जब दोनों ने एक दूसरे को देखा, तो बस देखते ही रह गए।" [1]
"तरु लताओं के मध्य दोनों किशोर एक टक एक दूसरे को निहार रहे हैं, दोनों के नयन कमल जो बड़े ठगने वाले हैं, एक दूसरे को ही जैसे ठग रहे हैं, अब इन दोनों का निवारण कौन कर सकता है।" [2]
रहै दोऊ बदन निहार निहार।
फुलवा बीनत श्याम सखन संग इत श्यामा सुकुमार॥ [1]
लता-तरुन में रह गये इक टक कौन सके निर्वार।
नागरिया लगे नैन दुहुँनि के बड़े ठगन ठगवार॥ [2]
- श्री नागरीदास (महाराज सावंत सिंह जी), श्री नागरीदास जी की वाणी, उत्सव माला (41)
श्री नागरीदास कहते हैं, "रमणीक श्री वृन्दावन मे श्री श्यामसुंदर अपने सखाओं के संग पुष्प चयन कर रहे हैं एवं उसी समय वहाँ अति सुकुमार श्री श्यामा जू आ गईं और जब दोनों ने एक दूसरे को देखा, तो बस देखते ही रह गए।" [1]
"तरु लताओं के मध्य दोनों किशोर एक टक एक दूसरे को निहार रहे हैं, दोनों के नयन कमल जो बड़े ठगने वाले हैं, एक दूसरे को ही जैसे ठग रहे हैं, अब इन दोनों का निवारण कौन कर सकता है।" [2]

